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हिन्दी


हिन्दी, भारत की राष्ट्रीय व आधिकारिक भाषा है । लगभग १८० मिलियन भारतीय हिन्दी का उपयोग अपनी मातॄ-भाषा के रूप में करते है और समस्त विश्व में अनेकों मिलियन व्यक्ति इसे अपनी द्वितीय भाषा के रूप में करते है । संस्कॄत से उद्वभव होने के कारण, इसके अन्दर फ़ोनेटिक व भाव दोनों ही गुण है । इसने अपने को अन्य भाषाओं जैसे कि फ़ारसी, अरबी, अंग्रेजी इत्यादि से अपने को उन्नत बनाया है ।

मै आभारी हूँ, हिन्दी के प्रबुद्ध विद्वान, अध्यापक एवंम शोध-कर्ता डॉ० अशोक तिवारी का, जिन्होंने निम्नलिखित विषय-वस्तु प्रदान की है । आपने "निरला साहित्य में सांस्कॄतिक अनुशीलन" विषय पर अपना शोध कार्य किया है ।


हिन्दी भाषा

‘भाष्’ धातु से भाषा शब्द की रचना हुई है। इसका अर्थ है बोलना । हम अपने विचारों और भावों को बोल कर व्यक्त करते हैं, इसीलिये इसे भाषा कहते हैं। जिस साधन के द्वारा मनुष्य अपने भावों और विचारों को बोलकर या लिखकर प्रकट करता है उसे भाषा कहते है |  मानव-जगत अपने विचारों और भावों की अभिव्यक्ति बोलकर अथवा लिखकर करता है। प्रारम्भिक अवस्था में मानव-समाज अपनी बात कहकर ही अपना काम चला लेता था। परंतु बाद में मौखिक ध्वनियों को लिखित रूप दिया जाने लगा,जिसे लिपि कहते हैं। हिन्दी भाषा की लिपि देवनागरी है जो प्राचीन ब्राह्मी लिपि की उत्तराधिकरिणी है।

भाषा मनुष्य के विचारों के आदान- प्रदान का माध्यम है। विश्व की लगभग 3000 भाषाओं को मुख्य रूप से तेरह पारिवारों में बांटा गया है । जिनमें सबसे बडे परिवार भारोपीय परिवार की एक प्रमुख भाषा हिन्दी है।

भारोपीय भाषा-परिवार की भारतीय शाखा को भारतीय आर्य-भाषा–शाखा भी कहा जाता है। इसकी प्राचीनतम भाषा वैदिक संस्कृत है । इससे ही हिन्दी भाषा और अन्य भारतीय भाषाओं का विकास निम्नलिखित रूप में हुआ है -

  • वैदिक संस्कृत (1500 ईसा पूर्व से 800 ईसा पूर्व तक )- जिसमें प्रख्यात 4 वेदों की रचना हुई ।
  • लौकिक संस्कृत (800 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व तक )- जिसमें रामायण , महाभारत आदि विशाल काव्य-ग्रंथ लिखे गये।
  • पाली प्राकृत ( 500 ईसा पूर्व से 500 ई0 तक ) – लौकिक संस्कृत का परिवर्तित रूप जिसमें बौद्ध साहित्य लिखा गया।
  • अपभ्रंश ( 500 ई0 से 1000 ई0 तक )- प्राकृत का परिवर्तित रूप।
  • हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषायें ( 1000 ई0 से )- आज तक प्रयुक्त हो रही है ।

ऊपर के विकास क्रम से स्पष्ट हो जाता है कि हमारे देश की आधुनिक भाषायें(सिन्धी, पंजाबी,कश्मीरी,गुजराती, मराठी, उडिया, असमी, बंगला तथा हिन्दी की समस्त बोलियां) अपभ्रंश से ही विकसित हुईं हैं। दक्षिण भारत में बोली जाने वालीं तमिल,तेलुगु, कन्नड और मलयालम में संस्कृत भाषा के शब्द प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं।अतः शब्दावली के आधार पर ये भाषायें भी हिन्दी के अत्यंत निकट हैं।दक्खिनी, बम्बइया तथा असमिया हिन्दी ने वर्तमान हिन्दी भाषा को व्यापक रूप दिया है।

जिस खडी बोली हिन्दी को 14 सितम्बर 1949 को भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया गया है,वह पश्चिमी हिन्दी से विकसित हुई है।हिन्दी भाषा का भौगोलिक विस्तार काफी दूर –दूर तक है जिसे तीन क्षेत्रों में विभक्त किया जा सकता है:-

  • क- हिन्दी क्षेत्र – हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी की मुख्यत: सत्रह बोलियाँ बोली जाती हैं , जिन्हें पाँच बोली वर्गों में इस प्रकार विभक्त कर के रखा जा सकता है- पश्चिमी हिन्दी,पूर्वी हिन्दी , राजस्थानी हिन्दी, पहाडी हिन्दी, बिहारी हिन्दी।
  • ख- अन्य भाषा क्षेत्र – इनमें प्रमुख बोलियाँ इस प्रकार हैं- दक्खिनी हिन्दी (गुल्बर्गी, बीदरी,बीजापुरी तथा हैदराबादी आदि), बम्बइया हिन्दी, कलकतिया हिन्दी तथा शिलंगी हिन्दी(बाजार-हिन्दी ) आदि ।
  • ग- भारतेत्तर क्षेत्र – भारत के बाहर भी कई देशों में हिन्दी भाषी लोग काफी बडी संख्या में बसे हैं। सीमावर्ती देशों के अलावा यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, रुस ,जापान ,चीन तथा समस्त दक्षिण पूर्व व मध्य एशिया में हिन्दी बोलने वालों की बहुत बडी संख्या है। लगभग सभी देशों की राजधानियों के विश्वविद्यालयों में हिन्दी एक विषय के रूप में पढी- पढाई जाती है। भारत के बाहर हिन्दी की प्रमुख बोलियाँ – ताजुज्बेकी हिन्दी,मारिशसी हिन्दी, फीज़ी हिन्दी,सूरीनामी हिन्दी आदि हैं ।

बोलने वालों की संख्या के अनुसार हिन्दी विश्व में तीसरे स्थान पर है। हिन्दी की लिपि देवनागरी एक वैज्ञानिक लिपि है, इसमें जो बोला जाता है वही लिखा जाता है। संसार की किसी भी भाषा को उसके मूल भावों में देवनागरी में लिखा जा सकता है। साथ ही साथ इसकी सरलता, गतिशीलता तथा बोधगम्यता ने इसे एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया है । हिन्दी फिल्में तथा साहित्य ने ऐसा कमाल कर दिखाया है कि चावल की डंडियों से खाने वाले मुल्कों का राजनीतिक नेतृत्व भारत के प्रति भले ही कठोर हो पर उनकी नई पीढी आज भी हिन्दी सिनेमा के गीतों पर थिरकती नज़र आती है। हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय नई दिल्ली, हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, नागरी प्रचारिणी सभा काशी तथा अन्य अनेकों संस्थायें इसे विधिवत सजाने-संवारने के काम में अनवरत संलग्न हैं।

काबुल से लेकर बंगाल तक तथा श्रीनगर से कोलम्बो तक समस्त हिन्दी प्रेमी एक ही स्वर में बोल रहे हैं
जय हिन्दी ! जय हिन्दुस्तान!

- डॉ० अशोक तिवारी

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