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पॄष्ट |
2.
लघु योजनायें बनायें
हमें अपने लिए छोटे-छोटे उद्वेश्य बनाना चाहिए तथा उनका
विश्लेषण कर लेना चाहिए,
जिससे हमारे अन्दर इन उद्वेश्यों को पूरा करने की शक्ति जग जायें ।
- हम अपना एक छोटा सा उद्वेश्य बनायें कि हम हम क्या
चाहते है ? शुरू-शुरू में, भौतिक चीजों के, पढ़ाई के, खेल-कूद के उद्वेश्य
बनाएँ । जब ये छोटे-छोटे उद्वेश्य पूर्ण होने लगे या हम जब चाहें, इनको
पूर्ण करने के योग्य हो जायें, तब तन-मन की शान्ति के उद्वेशय बनायें ।
- अब उस उद्वेश्य के बारे में सोचो कि इस
उद्वेश्य से मुझको क्या फ़ायदा है ? मै इससे क्या प्राप्त करना चाहता हूँ ?
इस उद्वेश्य से सम्बन्धित जो लोग है उनसे मुझको क्या फ़ायदा होगा ? क्या
मुझको ये उद्वेश्य बनाना चाहिए ?
- जब निर्णय हो जाए कि हमको क्या करना चाहिए
या क्या करना है तब हम ये सोचें कि इसके लिए क्या-क्या बनायेगें । आप जो
भी योजनायें बनायें उनको नम्बर डालकर
(१, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८,................) लिखें जिससे आपको पता लगता
रहें कि आप किस तरह अपने उद्वेश्य की प्राप्ति के लिए, उद्वेश्य की तरफ़
बढ़ते जा रहे है? यदि आपको ये प्रतीत हो कि हमारा उद्वेश्य कुछ ज्यादा ही
उठ गया है तो उस उद्वेश्य में परिवर्तन कर लें ।
- योजना बना लेने के बाद यह देखें कि उस योजना के अनुसार
तुमको क्या-क्या और कितना आता है और कितना नहीं? हमें क्या सीखना है? इस
कार्य को पूर्ण करने के लिए तुम्हारा व्यक्तित्व कितनी मदद दे सकता है?
यहाँ पर अपने को धोखा मत दो बल्कि पेन्सिल लेकर लिखो कि हमारे पास
क्या-क्या है, क्या-क्या हमको आता है और
जो कुछ हमको सीखना या जानना है उसके लिए हम क्या-क्या इंतजाम करेगें,
कहाँ-कहाँ से ज्ञान प्राप्त करेगें, किन-किन से सीखेगें और कितना समय
देगें?
- हमारे व्यक्तिगत स्वभाव में तो कोई ऐसी खराबी नहीं है
जिससे हमको लोग मदद न दें ।
हमारा परिवार के साथ, जान-पहचान वालों के साथ, काम करने वालों के साथ,
मित्रों के साथ तथा अन्य व्यक्तियों के साथ किस तरह का व्यवहार है? हम
लोगों से मिलने पर हिचकते तो नहीं है, अगर ऐसा है तो क्यों? हम दूसरों में
दिलचस्पी लेते है कि नहीं । हम दूसरों के सुख-दुःख में भाग लेते है कि
नहीं । हमारे रिश्ते गलत तो नहीं है ? हम दूसरों में बुराइयाँ तो नहीं
ढ़ुँढते है? इन प्रश्नों का बहुत सच्चाई से अपने मन को उत्तर दो ।
- अगर आप दुःखी है, भयभीत है तो मेरे मन में तनाव है या
मेरे मन में डर है, इस बात को बिल्कुल सही-सही सोच कर लिखें कि इसका कारण
तुम्हारे अनुसार क्या है ? शुरू-शुरू में जितना, आप कर सकते हो, उतना ही
करने का प्रयास करें और अपने को हीनता की दॄष्टि से ना देखें । न अपने को
दूसरों के सामने नीचा दिखायें । आवश्यकता इस बात ही है कि जो आपकी
कमजोरियां है, रूकावट है, उनको खुशी-खुशी
स्वीकार कर लें और अपने पर भरोसा रखकर उन्हें दूर करने की कोशिश करें ।
अपनी किसी भी परेशानी और कमजोरी
के लिए किसी दूसरे को दोषी ना ठहरायें । न तो अपने भाग्य को, न अपनी
परिस्थितियों को, न अपने चारों ओर के
वातावरण को, न अपने मिलने-जुलने वालों को । हर कमजोरी का कारण आप खुद है ।
- हमेशा याद रखें:-
- जानने की कोशिश करें कि ऐसा क्यों हुआ ?
- विश्वास करें कि हम अपनी कमजोर आदतों को बदल सकते है
।
- जब एक बार निर्णय ले लें और जान लें कि आप क्या
चाहते है तो उसे पूरा करके ही छोड़ें ।
- अपनी समस्या का स्वंय मुकाबला करें । एक निश्चित
निर्णय लें और उस निर्णय को लेकर चलें ।
- हमेशा याद रखें कि आप अपने से भाग कर कहीं नहीं जा
सकते है ।
- किसी के पास जाना और उससे राय या मदद माँगना, अपने
स्वंय के अन्दर स्थित ईश्वर का अपमान है । किसी बात के लिए निर्णय आप
स्वंय लें । इसमें दूसरों की मदद ना माँगें । माँ-बाप को अपनी सन्तान को
इस बात के लिए तैयार करना चाहिए कि वे अपनी प्रत्येक बात या मामले से
सम्बन्धित निर्णय स्वंय लें ।
इधर-उधर भागने की बजाय, आप अपने
निर्णय स्वंय लें ।
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