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प्रस्तावनापीछे ||  जीने की कला - स्वयं को जाने||
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1. स्वयं को जाने

।अ। आप अद्वितीय है ।

दर्पण के सामने खड़े होकर स्वयं को देखिए और फ़िर ये सोचिये कि कहीं आपने अपने जैसे स्वरूपवाला कोई व्यक्ति देखा है । जब आप जैसा इस संसार मे दूसरा कोई नहीं है, तब हमें अपनी तुलना भूलकर या अनजाने में भी किसी दूसरे से नहीं करनी चाहिए । आपको स्वयं से प्यार करना चाहिए क्योंकि इस संसार में आप जैसा दूसरा कोई नहीं है । यदि आपने खुद को प्यार नहीं किया तो आप दूसरों को भी प्यार नहीं कर पाएगें । इसलिए आप अपने को महान समझें । यहाँ इस बात का तात्पर्य घमंड करने से नहीं है ।

तुलना से प्रतियोगिता होती है और प्रतियोगिता से तनाव होता है । यदि हर आदमी अपने को महान समझे और अपनी तुलना किसी से ना करें, फ़िर न तो प्रतियोगिता का जन्म होगा तथा न ही तनाव होगा । यदि हम महान बनना चाहते है तो दूसरों को नहीं बल्कि स्वयं अपने को देखें । यदि आप अपनी तुलना किसी अन्य से करेगें तो, या तो आप हीन-भावना के वशीभूत हो जाएगें या क्रोध के । यहाँ पर हमें एक बात और याद रखनी चाहिए कि हम जैसे महान है उसी प्रकार हमें महान कार्य भी करने चाहिए । हमें दूसरों पर हँसना नहीं चाहिए क्योंकि जो लोग दूसरों पर हँसते है वास्तव में वे स्वयं अपने ऊपर हँसते है ।

।ब। आपके कण-कण में ईश्वर व्याप्त है:-

संसार के कण-कण में ईश्वर व्याप्त है । मानव शरीर कोषों (सेल्स) से मिलकर बना है तथा इन कोषों के अन्दर स्थित केन्द्र में सम्पूर्ण चेतना है । इस सम्पूर्ण चेतना को हम ईश्वर कहते है । चूंकि मनुष्य का शरीर ही नहीं बल्कि दुनिया की हर वस्तु कोषों से मिलकर बनी है इसलिए प्रत्येक वस्तु में और हमारे कण-कण में ईश्वर व्याप्त है । इसलिए जो ईश्वर कर सकता है वो मै भी कर सकता हूँ । ये बात रोज अपने आप को समझाएँ कि प्रत्येक के अन्दर एक ही ईश्वर है । इस कारण जो ईश्वर का स्वभाव है वही आपका भी है ।

।स। ईश्वर क्या है और उसका क्या स्वभाव है? :-

गीता में श्री भगवान या ईश्वर शब्द बार-बार आया है । इस भगवान शब्द का अर्थ है--

ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रिय ।
ज्ञान वैराग्योस्चैव पण्णां भग इतीरणा ॥

अर्थात् सम्पूर्ण बल, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य, इन छः का नाम भग या विभूति है । यह सब विभूतियां जिसमें सम्पूर्ण हों, वही भगवान है । इन छहों में बल के अन्तर्गत आत्मबल, तपोबल, बाहुबल आदि समस्त बलों का समावेश है । धर्म में समस्त कुल, आश्रम, जाति, देश, राज्य, नीति और जीव के कर्त्तव्य कर्मादि सम्मिलित है । यश में सभी प्रकार के यश है । श्री में सभी सम्पदा, धन, अन्न, द्रव्य, पशु और भूमि इत्यादि है । ज्ञान के अन्तर्गत सभी प्रकार के ज्ञान, विज्ञान, शास्त्र, कला और आविष्कार आदि है । जगत के यावत विषयों में रहते हुए उनमें लिप्त न होते हुये भोगने का अर्थ वैराग्य है ।

उपर्युक्त विवेचन से ज्ञात होता है कि इन सबको ईश्वर ही हस्तगत कर सकता है । परन्तु अंश के रूप में मनुष्य इसके किसी एक विभाग या विषय में भी सिद्धि प्राप्त कर लें तो उसी अंश रूप के अनुपात में, अन्य शेष पाँच विभूतियाँ भी उसको स्वतः ही प्राप्त हो जाती है, यह एक विचित्रता है ।

ईश्वर का स्वभाव ये है कि वो जो भी कहता है वो हो जाता है । इसलिए अगर हम अपने को अच्छा कहेगें तो, अच्छे हो जायेगें, अगर अपने को अमीर कहेगें तो अमीर हो जायेगें । समुद्र के एक बूँद पानी का विश्लेषण करें अथवा पूरे समुद्र के पानी का, उनमें समानता स्वाभाविक है । इसलिए चाहे आप छोटे हों या बड़ें, आप में और सबमें कोई अन्तर नहीं है ।

हमेशा ही महान व्यक्तियों ने जन्म लिया है और हमेशा ही जन्म लेते रहेगें । कभी भी महान व्यक्तियों की कमी नहीं होती है इसलिए आप भी महान बन सकते है । मनुष्य ने ही इस संसार में चमत्कारिक कार्य किये है । आप भी मनुष्य है इसलिए आप भी वे सभी कार्य कर सकते हैं ।

हो सकता है कि कुछ गलत सोचने से, कुछ कमजोरियों से, कुछ गलत वातावरण में बैठने से या किसी अन्य कारण से आपमें कुछ कमजोरियां आ गई हो, पर उन्हें आसानी से दूर किया जा सकता है । अतः हम अपने अन्दर झांक कर देखें कि हमारे अन्दर क्या महानतायें है, उनको हमें और ऊपर उठाना चाहिए और जो कमजोरियां हैं जो कि पहले नहीं थी पर बाद में कुछ गलत कारणों या वजहों से हमारे अन्दर आ गई है, उनको दूर करना चाहिए ।

इस बात के लिए हम अपने को साफ़-साफ़ विश्लेषित करेगें और न तो हम यहाँ पर कोई बात छुपायेगें और न ही सकोंच करेगें । यह बात भी हमें याद रखनी चाहिए कि हमारी समस्याओं का हल कोई दूसरा नहीं बल्कि हम स्वयं ही निकालेंगे ।

कभी न कहें कि हम पापी हैं । जब ईश्वर में पाप नहीं है तो ईश्वर द्वारा बनाई गई वस्तुओं में पाप कैसे हो सकता है । हमारे कण-कण में ईश्वर व्याप्त है तब हम पाप कैसे कर सकते है? स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि एक वेश्या में भी उतनी ही आत्मा होती है जितनी की एक सती-सावित्री में होती है । जब आप अपने आप एकाकार करेगें तब आपके समक्ष आने वाली हरेक समस्या नतमस्तक हो जाएगी । जो व्यक्ति यह दिखाता है कि वह दूसरों की तुलना में कमजोर है, तो अहल में वह संसारिक चीजों की ओट लेकर अपनी महानता दिखाना चाहता है । जब हम किसी दूसरे की महानता की आड़ लेकर जीना चाहते है तो ये हमारी दास-मानसिकता कहलाती है।

प्रत्येक मनुष्य अपने आप में सम्राट है ।


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